काजीरंगा का नाम लेते ही आंखों के सामने एक सींग वाले गैंडे का दृश्य उभर आता है। काजीरंगा राष्ट्रीय पार्क न केवल भारत में वरन पूरे विश्व में एक सींग वाले गैंडे के लिए प्रसिद्ध है। यह राष्ट्रीय पार्क असम का एकमात्र राष्ट्रीय पार्क है। यह केंद्रीय असम में स्थित है। यह उद्यान उबड़-खाबड़ मैदानों, लंबे-ऊंचे घासों, आदिवासियों और भयंकर दलदलों से पूर्ण कुल 430 वर्ग की. मी.में फैला हुआ है। यूनेस्को द्वारा घोषित विश्व धरोहरों में से एक काजीरंगा राष्ट्रीय पार्क 2005 में 100 वर्ष का हो गया है।
यहां की स्थानीय जनजाती कार्बी के शब्दों में काजीरंगा का अर्थ है- ''वह स्थान जहां पहाड़ी बकरा पानी पीता हो'। पुर्व में यह दलदल से घिरा हुआ एक ऐसा क्षेत्र था जहां पहुंच पाना काफी मुश्किल था। इन्हीं कुछ विशेषताओं के साथ काजीरंगा का अपना एक अलग और रोचक इतिहास है। अतीत के पन्नों में झांकने से यह पता चलता है कि लेडी कर्जन ने काजीरंगा में एक सींग वाले गैंडे के बारे में पहली बार अपने चाय बागान में काम करने वाले साथी से 1904-05 में सुनी थी। उत्सुकतावश वह इस अद्भुत जंगली जीव को देखने भी गईं। लेकिन वह गैंडे को तो नहीं देख पायी अलबत्ता इस लोमहर्षक जानवर के तीन अंगुलियों के साथ पांव के निशान को जरूर देखा। इस दृश्य को देखने के बाद उन्होंने अपने पति लॉर्ड कर्जन से इस अनोखे वन्यजीव को बचाने हेतु उपयुक्त उपाय करने का आग्रह किया। परिणामस्वरूप लार्ड कर्जन ने जून 1905 में एक विज्ञप्ति जारी करते हुए 57,273.60 एकड़ में फैले इस भूखंड को आरक्षित क्षेत्र बनाने की घोषणा कर दी।
इसके लगभग तीन साल बाद 3 जनवरी 1908 को काजीरंगा को आधिकारिक रूप से 'आरक्षित वन' घोषित कर दिया गया। इसके फलस्वरूप इस क्षेत्र में शिकार करना अवैध हो गया। 13 जनवरी 1913 को इस आरक्षित क्षेत्र में 13,506 एकड़ जमीन और मिलाकर इसका क्षेत्र विस्तार किया गया। 10 नवंबर 1916 में काजीरंगा को गेम सैंक्चुअरी घोषित कर दिया गया। 1938 में इस पार्क के मुख्य संरक्षक ए.जे.डब्ल्यू मीलरॉय ने किसी भी प्रकार के शिकार पर रोक लगा दी और इसे आम लोगों के लिए खोल दिया। 1950 में वरिष्ठ वन्य संरक्षक डी स्ट्रेसी ने 'गेम' शब्द को हटाकर इसका नाम 'वन्यजीव अभ्यारण्य' कर दिया। वक्त के साथ-साथ न केवल इसका दायरा बढ़ता गया वरन आज इसकी गिनती विश्व के महत्वपुर्ण अभयारण्यों में होती है। इस पार्क में प्रसिद्ध एक सींग वाले गैंडे के अलावा हाथी, जंगली भैंसा, दलदली हिरण, सांभर, जंगली सुअर, जंगली भालू, बाघ, तेंदुआ, जंगली बिल्ली, लंगूर, सियार, फाख्ता आदि जानवर प्रमुख रूप से पाए जाते हैं। शरद ऋतु में यहां प्रवासी पक्षियों का आगमन भी होता है। इस पार्क की खुबसूरती एवं जैव विविधता को देखते हुए ही इसको 11 फरवरी 1974 को 'राष्ट्रीय पार्क' घोषित कर दिया गया।
दिलचस्प बनाएं शैर काजीरंगा की शैर को अन्य गतिविधियों के द्वारा और भी रोमांचक बनाया सकता है। जैसे शफारी के माध्यम से काजीरंगा में वन्यजीवों को देखना अपने आप में एक रोमांचक अनुभुति देता है। सैलानी पार्क के पश्चिमी भाग बागोरी को भी देख सकते हैं। अमूमन यह भाग सैलानियों द्वारा अनछुआ रह जाता है। इसी क्रम में आप निम्नलिखित स्थलों को देखकर अपने शैर को यादगार बना सकते हैं-
सफारी से शैर काजीरंगा जानेवाले पर्यटक जीप और हाथी के सफारी से शैर करने का लुत्फ अवश्य उठाते हैं। अगर आप सही समय पर शैर करने जाते हैं, तो आप दो दिनों में ही अनेकों जानवर को देख सकते हैं। वन विभाग की ओर से वाहन की सुविधा मुहैया नहीं कराई जाती है। अगर आप जीप आदि से पार्क की शैर करना चाहते हैं तो आपको या तो होटल या फिर कोहोरा चौक से वाहन का इंतजाम करना होगा। ध्यान रहे सफारी नियत समय तक ही चलने दिया जाता है। साथ ही इसके नियमों को बहुत कठोरता से लागू किया जाता है। समय सारणी इस प्रकार है- जीप सफारी -: पुर्वाह्न 7.30 से 9.30 तक एवं अपराह्न 2 से 3.30 तक। हाथी सफारी -: सुबह 5 से 6 बजे तक और शाम 6 से 7 बजे तक। शुल्क -: भारतीयों के लिए 120रू. और विदेशियों के लिए 750रू.।
कोहोरा यह सबसे लंबा टूरिस्ट रूट है। 3 से 4 घंटे की सफारी यात्रा के दौरान काजीरंगा पार्क का संपूर्ण लुत्फ उठाया जा सकता है। मार्ग में प्रसिद्ध गैंडे के अलावा हाथी और जंगली भैंसों को भी देखने का मजा उठाया जा सकता है। इसके साथ इस रूट के उत्तरी छोड़ पर छोटी नदियों के नैसर्गिक सौंदर्य का भरपूर आनंद उठाया जा सकता है। साथ ही छोटे आकार के झीलों में हाथियों के द्वारा किए जा रहे करतब अपने आप में एक अनूठा अनुभव होता है। हालांकि इस पार्क में बाघों को सामान्य तौर पर नहीं देखा जाता है, लेकिन अगर आप भाग्यशाली हैं तो इसको देखने का रोमांचपूर्ण अनुभव ले सकते हैं। आमतौर पर पार्क के हाथी दोपहर बाद मिहिमुख, जो कोहोरा सर्किट के समीप है, के झरनों में नहाने का लुत्फ लेते हैं। ऐसे में सैलानी खासकर बच्चे हाथियों को नजदीक से देख सकते हैं।
बागोरी यह पार्क का पश्चिमी छोड़ है, जो पार्क के विहंगम दृश्य को देखने के लिए जाना जाता है। इस रूट पर शाम को घूमने का मजा ही अलग है। यह वह वक्त होता है जब हाथियों का झुंड घास के खुले मैदान में अंगराई ले रहे होते हैं। शाम के वक्त आप सौभाग्य से ही सही दलदल में हिरणों की गतिविधियों को देख सकते हैं, जिसको इस पार्क का श्रृंगार भी कहा जाता है। जंगली भैंसा, गैंडे और कभी-कभार हाथियों को भी देखा जा सकता है।
पनबारी रिजर्व फारेस्ट यह कोहोरा के पूर्वी छोड़ पर स्थित है। 10 किलोमीटर लंबा यह रिजर्व फारेस्ट काजीरंगा के बाकी हिस्से को कार्बी आंगलोंग से जोड़ता है। यहां पर विभिन्न तरह के पक्षि प्रचूर मात्रा में पाए जाते हैं। अत: अगर आप पक्षियों को देखने के शौकीन हैं तो काजीरंगा में आपकी यह इच्छा भी पूरी हो सकती है। दूसरी तरफ अगर आप प्राकृतिक सौंदर्य के प्रेमी हैं तो अस्त होते सूर्य के साथ सुनहले रंगों में रंगी यहां के खुबसूरत पहाडियों को देखने का अद्भुत मजा भी लिया जा सकता है। पनबारी में प्रवेश करने के लिए आपको कोहोरा बेस से गार्ड लेना होगा। साथ में अगर आप जीप के माध्यम से घूमने के इच्छुक हैं तो एक जीप को हायर करने में आपको 350 रू. से लेकर 400 रू. तक का खर्च आ सकता है। पनबारी जाने का रास्ता आगराटोली नामक जगह से होकर जाती है। यहां पर वन्यजीव रक्षा और पुनर्वसन केंद्र भी अवस्थित है। यह केंद्र भारत वन्य जीव न्यास तथा राज्य वन विभाग द्वारा चलाया जा रहा है। यह सैलानियों के लिए प्रतिबंधित है।
आगराटोली तीन रूटों में यह मार्ग कोहोरा बेस से 21 की.मी. सुदूर पूर्व में स्थित है। यह भाग अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा ज्यादा घना है जिसके वजह से वन्यजीवों को देख पाना थोड़ा मुश्किल है। गार्डों के अनुसार यहां प्राय: बाघ देखने को मिल जाता है। इस मार्ग पर पक्षियों की बहुलता है।
बर्डवाचिंग यह तथ्य बहुत कम लोगों को मालूम है कि काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान पक्षि प्रेमियों के लिए स्वर्ग है। कार्बेट राष्ट्रीय पार्क के बाद काजीरंगा दूसरा ऐसा उद्यान है जहां पक्षियों की विविधता और बहुलता दोनों एक साथ देखने को मिलती है। इस उद्यान में 450 से ज्यादा पक्षियों की प्रजातियां पाई जाती है। जिसमें प्रवासी पक्षियां भी हैं। काजीरंगा पार्क में लुप्त हो रहे बंगाल फ्लोरिकन के अलावा हार्नबिल और उल्लू की प्रजातियां भी देखने को मिल जाती है।
गांव भ्रमण वन्य जीव को देखने के अलावा आप यहां के करीबी गांवों जैसे कार्बी या मिसींग आदि में जाकर वहां के हस्तशिल्प कला से रूबरू हो सकते हैं। आगंतुकों के अनुरोध पर वाइल्ड ग्रास रेजॉर्ट सैलानियों के लिए दो घंटे या आधे दिन के लिए ट्रिप की व्यवस्था करता है। 2 घंटे की ट्रिप के लिए 200रू. और आधे दिन की ट्रिप के लिए 450 रू. देने होते हैं। अगर आप पिकनिक मनाने के इच्छुक हैं तो कोहोरा रेंज में स्थित छोटी नदियों के किनारे आप मौज-मस्ती कर सकते हैं।
आसपास जोरहट काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के 97 कि.मी. पूर्व में स्थित है। शहर से 13 कि.मी. की दूरी पर निमाती घाट (कालाबारी घाट से एक घंटे का सफर) स्थित है। यहां से आप 2 दिन की ट्रिप पर विश्व की सबसे बड़ी रिवर आइलैंड माजुली जा सकते हैं। इस आइलैंड का सांस्कृतिक इतिहास 500 वर्ष पुराना है। यहां ठहरने के लिए एकमात्र जगह सत्रास (वैष्णव मठ) है। ज्यादा जानकारी के लिए एस.डी.ओ.(नागरिक प्रशासन; दूरभाष- 03775 274426),गढ़मौर, माजुली से संपर्क किया जा सकता है।
डिब्रूगढ़ के पास डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान, जो जंगली घोड़ों के लिए प्रसिद्ध है और पानी-दिहींग पक्षि अभ्यारण्य दो ऐसे विकल्प हैं, जहां आप काजीरंगा के अलावा भी वन्य जीवों को देखने का लुत्फ उठा सकते हैं।
इन जगहों की शैर करने के लिए कुछ विश्वसनीय टूर ऑपरेटर हैं जो असम और अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों के लिए टूर आयोजित करते हैं। जैसे मानस, ओरंग और काजीरंगा पार्क आदि। असम-बंगाल नेविगेशन विशेष तौर पर नदियों के लिए शैर आयोजित करते हैं।
ऐसे पहुंचे काजीरंगा काजीरंगा गोवाहाटी से 250 कि.मी. पूर्व और जोरहट से 97 कि.मी. पश्चिम में स्थित है। राष्ट्रीय राजमार्ग-37 सीधे गोवाहाटी से काजीरंगा तक (वाया दिसपुर, नागांव, जखालाबंधा और हाथीकुली)। काजीरंगा गोवाहाटी एअरपोर्ट से 239 की.मी. और जोरहट एअरपोर्ट से 97 की.मी. दूर है। काजीरंगा जाने के लिए नियमित रूप से राज्य सरकार की बसें, ट्रैवल एजेंसीज के द्वारा चलाई जा रही बसें, टैक्सी आदि भी उपलब्ध हैं। काजीरंगा जाते वक्त मिलने वाले बस पड़ाव को कोहोरा के नाम से जानते हैं। काजीरंगा से नजदीकी रेलसेवा 75 कि.मी.दूर है।
वन्यजीव विभाग कार्यालय डी.एफ.ओ. फारेस्ट ऑफिस, बोकाखाट दूरभाष- 03776 268007
सामान्य जानकारी गर्मियों में यहां तापमान लगभग 32 डिग्री सेल्सियस और जाड़ों में 10 डिग्री सेल्सियस रहती है। यहां औसतन 160 से.मी. तक वारिश होती है। सैलानियों को यह सलाह दी जाती है कि गर्मियों में सूती और सर्दियों में ऊनी वस्त्र का प्रयोग करें। यहां आने के लिए सबसे बेहतरीन मौसम नवंबर से अप्रैल माना जाता है। मई से अक्टूबर के बीच भी जाया जा सकता है।
भौगोलिक विशेषता काजीरंगा में जिस तरह जैव विविधता पाई जाती है, उसी तरह इसकी भौगोलिक स्थिति भी विविधताओं से भरा हुआ है। एक ओर जहां इस राष्ट्रीय पार्क में लंबे ऊंचे घासों का समतल मैदान है तो वहीं दूसरी ओर ऊबड़-खाबड़ भू-खंडों से घिरा हुआ छोटे-मोटे झील भी हैं। जो इसकी विशिष्ट भौगोलिक स्थिति को बखूबी दर्शाता है। काजीरंगा में सामान्य तौर पर लंबे ऊंचे घास पाए जाते हैं, लेकिन कहीं-कहीं छोटे किस्म के घास भी देखने को मिल जाते हैं। कुछ लंबे-लंबे पेड़ों के अलावा बेंत और गन्ने का झुरमुट भी आमतौर पर यहां पाया जाता है। अस्थायी तौर पर पाए जानेवाले जंगल यहां के जीवों के लिए खासतौर पर बाढ़ के दौरान उपयुक्त सुरक्षा प्रदान करते हैं। लेकिन वर्तमान में यह भूमि चाय बागान में परिवर्तित हो चुका है। जिससे यहां की पारिस्थितिकी संतुलन में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिलता है।
ब्रह्मपुत्र नदी की वजह से आनेवाले सालाना बाढ़ के कारण कई बार यहां कि स्थिति काफी गंभीर हो जाती है। खासकर 1998 और 2004 में यहां भीषण बाढ़ के कारण बड़ी मात्रा में जंगली जानवर हताहत हुए थे। इस दौरान के बाढ़ की भीषणता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि काजीरंगा में उस दौरान बहुत कम ऊंचे स्थान बचे थे। परिणामस्वरूप जंगली जानवरों को काफी परेशानी हुई थी। लेकिन आमतौर पर बाढ़ काजीरंगा के जैव विविधता, खासकर जलजीवों के लिए वरदान साबित होता है।
1985 में युनेस्को द्वारा विश्व धरोहर में शामिल किया गया यह पार्क अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना एक अलग पहचान रखता है। पूरे विश्व में यह एक सींग वाले गैंडे के लिए एकमात्र संरक्षित अभयारण्य के रूप में जाना जाता है। वर्तमान में इस पार्क में कुल 1,500 से ज्यादा एक सींग वाला गैंडा है। आंकड़ों के अनुसार यह पार्क विश्व के 70 फीसदी दलदली जीवों और जंगली भैसों का गृह भी है। यहां दलदली हिरण काफी मात्रा में पाए जाते हैं। इस पार्क में हुए जानवरों की हालिया गिनती में यह पाया गया है कि काजीरंगा में 1,000 से ज्यादा जंगली हाथी और गीले प्रदेश में पाए जाने वाले लगभग 450 प्रजातियों के अलावा जंगली पक्षियां भी पाई जाती हैं। इनमें से 18 प्रजातियां ऐसी हैं जिसके ऊपर लुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है।
मनीष